हमने sharelove क्यों बनाया
इसकी शुरुआत एक अंतिम संस्कार से हुई, और एक ऐसे मैसेज से जो अपना काम नहीं कर पाया।
एक दोस्त के पिता गुज़र गए। मैंने टाइप किया “आपके दुख में शामिल हूँ”, उसे देखा, मिटाया, फिर से टाइप किया, और फिर भी भेज दिया — क्योंकि और करते भी क्या? वह एक मीम और एक डिलीवरी नोटिफ़िकेशन के बीच किसी थ्रेड में जा पहुँचा। बात सच थी, पर उसका कोई वज़न नहीं था।
दिक़्क़त यह नहीं कि लोगों को परवाह नहीं। दिक़्क़त यह है कि जिन चीज़ों का हम सहारा लेते हैं, वे सब कुछ एक ही वज़न का बना देती हैं। जन्मदिन, प्रमोशन, किसी की मौत — वही फ़ॉन्ट, वही बबल, वही तीन सेकंड का ध्यान।
तो हमने इसका उल्टा बनाया। कुछ ऐसा जिसमें दो सेकंड नहीं, दो मिनट लगें। कुछ ऐसा जिसमें आपकी असली आवाज़ हो, क्योंकि आवाज़ वह कह जाती है जो टाइपिंग नहीं कह पाती — वाक्य से पहले का ठहराव, बीच में भर्राता गला। कुछ ऐसा जो किसी फ़ीड में दबने के बजाय अपने-आप में अलग पहुँचे।